प्रेरणादायक नैतिक कहानियां हिन्दी में
कहानियों का हर एक व्यक्ति के जीवन में बहुत महत्व होता है। बचपन से ही हर एक बच्चा अपने माता-पिता, दादा-दादी और नाना-नानी से कहानियां सुनकर बड़ा होता है। कहानियों से हमारे ज्ञान में वृद्धि होती है। खास तौर पर नैतिक कहानियां हमें कोई ना कोई शिक्षा प्रदान करती है जो हमें जीवन में काम आती है। पंचतंत्र, अकबर-बीरबल, तेनालीराम ,महाभारत आदि की कहानियों से हमें कोई ना कोई शिक्षा जरूर मिलती है। इस आर्टिकल में हम Short Story in Hindi With Moral में ज्ञानवर्धक नैतिक कहानियां लिखने जा रहे हैं जो कि हमें जीवन के प्रति में महत्वपूर्ण शिक्षा प्रदान करती है।
स्वभाव आचरण का प्रतिबिम्ब होता है
घमंडी राजा की कहानी
Short Story in Hindi With Moral: एक बार एक राजा इतना घमंडी स्वभाव का था कि अपनी प्रजा के सुख दुःख का ध्यान भी नहीं रखता था। इसलिए प्रजा भी राजा का सम्मान नहीं करती थी। इसलिए राजा अपमानित महसूस करता था। एक दिन राजा को जंगल में शिकार खेलते हुए एक सिद्ध महात्मा मिले।
राजा ने सिद्ध महात्मा से पूछा कि," मैं जानना चाहता हूं कि मेरी प्रजा मुझे उचित आदर - सम्मान क्यों नहीं देती जबकि राजा का सम्मान करना प्रजा का कर्तव्य है। महात्मा जी ने राजा के घमंडी स्वभाव के बारे में जानते थे, इसलिए वह चाहते थे कि राजा का घमंडी स्वभाव विनम्रता में बदल जाए।
वह राजा को एक चट्टान के पास ले गए और बोले इस पर एक पत्थर प्रहार करो। राजा ने जैसा ही प्रहार किया पत्थर चट्टान से टकरा कर नीचे गिर गया।
अब महात्मा ने राजा से कहा कि गीली मिट्टी से चट्टान पर प्रहार करे। राजा ने जैसे ही गीली मिट्टी से चट्टान पर प्रहार किया, मिट्टी चट्टान के साथ चिपक गई।
महात्मा जी ने कहा- हे राजन! विनम्रता को हर कोई जल्दी ग्रहण करता है और कठोरता को सभी त्याग देते हैं। इसलिये तुम भी अगर अपनी प्रजा से सम्मान पाना चाहते हो तो इस गीली मिट्टी की तरह बने ना कि कठोर पत्थर की तरह।
राजन! किसी का आचरण उसके व्यक्तित्व का प्रतिबिंब होता है। आपके स्वभाव के कारण ही आपकी प्रजा आपका सम्मान नहीं करती।
Moral - इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि हमारा आचरण हमारे व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब होता है इसलिए हम जैसा व्यवहार दूसरों से चाहते हैं वैसा व्यवहार दूसरों के साथ करना चाहिए।
ईश्वर पर विश्वास
श्री कृष्ण और चिड़िया ने की कहानी
महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले युद्ध भूमि को समतल करने के लिए पेड़ों को हटाया जा रहा था। श्री कृष्ण और अर्जुन वहां पर खड़े थे तभी एक चिड़िया ने वहां आकर श्री कृष्ण से प्रार्थना की कि," प्रभु मेरे बच्चों को बचा लो।" सामने जो हाथी खड़ा है उसने एक पेड़ को गिरा दिया जिस पर घोंसले में मेरे छोटे-छोटे बच्चे थे जो अभी उड़ नहीं सकते। मेरे बच्चे घोंसले सहित धरती पर गिर गए हैं।
श्री कृष्ण ने कहा- जो नियति में लिखा है वहीं होता है मैं उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता। चिड़िया बोली ठीक है लेकिन आप मुझे आप पर विश्वास करने से तो नहीं रोक सकते।
श्री कृष्ण बोले ठीक है - तुम अपने बच्चों के लिए उस घोसले में अच्छे से भोजन जमा कर लो।" दो दिन पश्चात महाभारत शुरू होने से पहले जब श्री कृष्ण और अर्जुन युद्ध भूमि में पहुंचे तो श्रीकृष्ण ने अर्जुन का धनुष बाण लेकर बाण चलाया तो उसी हाथी के गले में बंधी घंटी कटकर भूमि पर गिर गई जिसने चिड़िया का घोंसला गिराया था।
अर्जुन कहने लगे कि," लगता है आप का निशाना चूक गया। हाथी तो एकदम से सुरक्षित खड़ा है। आप कहे तो मैं कोशिश करूं।" श्री कृष्ण मुस्कुराए और कहने लगे कि नहीं मेरा काम हो गया ।
उसके बाद युद्ध शुरू हुआ और 18 दिनों तक चलता रहा। पांडव महाभारत का जीत चुके थे। एक बार फिर से श्री कृष्ण और अर्जुन युद्ध भूमि के स्थल पर पहुंचे
श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि," अर्जुन वह जो सामने घंटी पड़ी है उसे उठाओ।अर्जुन ने जैसे ही घंटा उठाया तो एकदम से विस्मित रह गया। उसमें वही चिड़िया थी जो युद्ध शुरू होने से पहले श्री कृष्ण से अपने बच्चों के लिए सहायता मांगने आई थी। चिड़िया घंटा उठाते ही अपने बच्चों सहित उड़ कर श्री कृष्ण की प्रदक्षिणा करने लगी। चिड़िया ने जाकर श्री कृष्ण से शुक्रिया कहा। अर्जुन यह सब देखकर एकदम से विस्मित थे।
Moral - इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि अगर हम पूर्ण समर्पण भाव से ईश्वर पर भरोसा करते हैं तो ईश्वर भी उस भरोसे को टूटने नहीं देते।
बिना सोचे-समझे कोई कार्य मत करो
पंचतंत्र की नेवले और ब्राह्मणी की कहानी
एक बार एक नगर में देवशर्मा नाम का ब्राह्मण रहता था। जिस दिन उसकी पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया उसी दिन एक नेवली ने एक शिशु को जन्म दिया। बच्चे को जन्म देने के पश्चात नेवली मर गई । ब्राह्मणी नेवले के बच्चे का भी पालन पोषण करने लगी। लेकिन उसके मन में हर समय यही शंका रहती कि कहीं नेवला हिंसक प्रवृत्ति के कारण उसके पुत्र को काट ना दे या फिर कोई नुकसान न पहुंचा दे।
एक दिन में पानी भरने तालाब पर जाने लगी तो अपने पति से कहा- जब तक मैं लौटकर न आऊं आप बच्चे के पास रहना। पत्नी को आने में देरी होती देख ब्राह्मण बच्चे को नेवले के पास छोड़ भिक्षा टन के लिए चला गया। कुछ समय के पश्चात जब ब्राह्मणी लौटी तो उसने नेवले के मुंह पर खून लगा देखा। उसका माथा ठनक गया की कही इसने मेरे बच्चे को नुकसान तो नहीं पहुंचा दिया है।
इसी शंका में उसने अपने सिर पर रखा घड़ा नेवले के ऊपर दे मारा। जिससे उसकी इस समय मृत्यु हो गई। ब्राह्मणी ने जब अंदर जाकर देखा तो उसका बच्चा खेल रहा था और पास में ही फर्श पर सांप के टुकड़े पड़े हुए थे। सांप को देखकर ब्राह्मणी समझ गई थी कि नेवले ने सांप से मेरे बच्चे की रक्षा की है।
यह सब देखकर ब्राह्मणी को बहुत पछतावा हो रहा था कि उसने पुत्र समान नेवले की हत्या कर दी।जब ब्राह्मण लौटा तो उसने सारी बात उसको बताई और कहने लगी कि मैंने अनजाने में अपने पुत्र की रक्षा करने वाले की ही हत्या कर दी। ब्राह्मण सुनकर बहुत दुखी हुआ और कहने लगा कि तुम्हें किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले उसके परिणाम के बारे में सोच लेना चाहिए था।
Moral - पंचतंत्र की इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि हमें आवेश में आकर कोई भी फैसला नहीं लेना चाहिए।
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